Posted by: ashwiniramesh | May 29, 2011

——डरावना गांव———कविता

गांव के पशु

खुलेआम बाजारी सडकों पर

घूमने लगें हैं

आदमी की तरह

सुनसान गांव में

प्रवेश करते हुए

मुझे डर लग रहा है

अब तो…………….

गांव उजड़ रहा है

जहर पचाने वाली

सुलगती मिटटी

पैदा कर रही है

काले और पीले पतों वाले पौधे

जो केवल

जहर पीकर ही

पल सकतें हैं

बढ़ सकतें हैं

और

जिंदा रह सकतें हैं

और

पैदा कर सकतें हैं

केवल

जहरीला फल

जिसके जहरीले स्वाद से

आदमी की नस नस में

भर गया है ज़हर

और

घर की अलमारियों में

घी के डिब्बों की जगह

सज गयीं हैं

छोटी बड़ी बोतलें

बच्चे

बूढ़े

और

औरतें

सब

बन गए हैं

केवल

एक अन्तरहीन पीढ़ी

जो केवल

आज और अब को

अपना जीवन दर्शन मानकर

चिन्तित हो उठे हैं

धूप से तपती

नंगी पहाड़ियां

चटक रही हैं पत्थर

तलहटी के सूखे

तालाबों को भरने के लिए

तो ऐसे में

मुझे क्या डर नहीं लगेगा ?

……………………………………………(प्रस्तुत कविता मेरे काव्य संग्रह, “जमीन से जुड़े आदमी का दर्द”,से उद्धृत की गयी है –अश्विनी रमेश)

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