Posted by: ashwiniramesh | May 26, 2011

यह कविता कई मंचों पर मेरी सबसे लोकप्रिय कविता रही है !

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http://mynaturalworld.blogprahari.comWindows Live BlogWindows Live BlogWindows Live Blogशिमला की मध्य पहाड़ियां हों

या हों काँगड़ा की धोलाधर पहाड़ियां

क्या फर्क है

मुझे तो

मैदानों

घाटियों

नदी नालों

और

खाइयों को पार करके

बस

पहाड़ से पहाड़ तक का

सफर तय करना है

और

जीवन भर खोजना है

केवल

यही एक सत्य कि

पहाड आखिर

जमीन होते हुए भी

जमीन से ऊँचा क्योँ है

और असमान छूते हुए भी

जमीन से जुड़ा क्योँ है

इन प्रश्नों का उत्तर

इतना सरल नहीं कि

भूगोल की एक किताब उठाकर

तुम कह दो कि

पहाड़

काश्मीर से असाम तक

फैली एक

हिमालय पर्वत श्रृंखला है

जिसकी सबसे ऊंची चोटी

माउन्ट एवेरेस्ट  ८८४८ मीटर ऊंची है

ये प्रश्न का कोई

वांछित उत्तर नहीं है

प्रश्न तो यह है कि

जमीन से जुड़े रहते हुए भी

आसमान को कैसे छुआ जाता है

और

जमीन होते हुए भी

पहाड़ कैसे बना जाता है

प्रश्न का उत्तर केवल पहाड से पहाड़ की यात्रा है

और

यात्री की हर साँस

उसका अदम्य विश्वास

और चोटी उसकी

इस विश्वस्त यात्रा का

वह चरम बिन्दु

जहाँ वह

जमीन

आसमान

और

पहाड की यात्रा के सुख को

एकाकार रुप

देखता

और

महसूस करता है

फिर एकसाथ

और

यही

पहाड़ से पहाड़ तक की

परम सुखदायी यात्रा का अन्त

और

यात्रा जारी है

………………………………………………….        (प्रस्तुत कविता मेरे काव्य-संग्रह—“जमीन से जुड़े आदमी का दर्द” से उद्धृत की गयी है-अश्विनी रमेश )NOKIA LIBRARY (47)

मेरी माँ ने

नही सीखा

काफ़ीहाउस में

घंटो बैठकर

काफी की चुस्कियों के साथ

भावुकता को पी जाना

और निश्चल होकर

सामने दिवार पर

टंगी घढ़ी में

समय की सुई के

चक्कर को ताकते रहना

उसने तो

हर पल

अनुभव किया है

लोहे और मिटटी के

संसर्ग से उत्पन

पसीने की धार की

गति का अबाध

बहते रहना

आधा पी जाना

और

शेष मिटटी में निचुड़ जाना

और

मिटटी के लिए

मिटटी चाटते और  सूंघते

मिटटी और लोहे से खेलते

पलते

और

बढ़ते

शिशु को जनना

और माँ ने

एक पहाड़ी से

दूसरी पहाड़ी का

सफर तय करते

महसूस किया है

भारट्ठे* से झुकी हुई

पीठ को देखकर

पहाड़ियों का

आदर से झुक जाना

और

उबड-खाबड़ पगडंडियों का

छोटा हो जाना

बस

मेरी माँ ने

यही सीखा है !

………………..

भारठे* अर्थ –पीठ पर के बोझे !

——————————————-(प्रस्तुत कविता मेरे काव्य-संग्रह –“जमीन से जुड़े आदमी का दर्द”से उद्धृत की गयी है-अश्विनी रमेश )NOKIA LIBRARY (65)

Posted by: ashwiniramesh | May 23, 2011

—-:तुम्हारे लिए: -कविता

आज तुम्हारी

मर्मस्पर्शी भावना ने

मुझे कितना

अंदर तक छुआ है

भावना

 जीवन की सच्चाई  है

मुझे

तुमने जीवन दिया है

मेरे पास

देने को कुछ भी नहीं

यह कविता है

शब्द

और अर्थ से रहित

कविता

जो केवल

आत्मा में बहती है

आत्मा…….

मेरे अंदर

निरंतर बहता

एक झरना

एक सत्य

जो कभी

टूटता नहीं

बिखरता नहीं

झरने का

चट्टानों को

काटकर

निरंतर

बहते रहने की

वेदना का सुख

उसकी लयबद्ध

संगीतमयी आत्मा है

एक अटूट सत्य है

प्रकृति है

जीवन है

जीवन…जो……

हम दोनों का

सत्य है

सत्य स्रोत

अंतिम

सत्य है

——————–(प्रस्तुत कविता मेरे काव्य संग्रह-“जमीन से जुड़े आदमी का दर्द से उद्धृत की गयी है )-

                                   —अन्तर—-

माँ !

तुम बांध क्योँ नहीं लेती

सत्तू

छाछ

जौ और कुकडी*के

पकवानों की यादों की पोटली

मैं आज गांव छोड़कर

शहर जा रहा हूँ

वह सब देखने

जो मैंने

यहां नहीं देखा

वह सब करने

जो मैंने

यहां नहीं किया

और

वह सब पाने और भोगने

जो यहां नहीं पाया और भोगा

या इससे भी बढकर

शायद अपनी अस्मिता की तलाश में

क्योंकि

आज

मेरी इच्छाएं और विवशताएं

एक होकर

मुझे

यहां से

दूर ले जाना चाहतीं हैं

और

अब तुमसे

बगावत करने के अतिरिक्त

मुझे कोई दूसरा रास्ता

दिखाई ही नहीं देता

यह जानते हुए भी कि

मुझे एक न एक दिन

वापस गांव तो

लोटना ही होगा

लेकिन तब तुम नहीं होगी

और मेरे लिए

गांव या शहर में

तब

केवल थोड़ा सा ही

अन्तर रह जाएगा

शब्दों का

‘गांव’

और

‘शहर’

———–

१.कुकडी*- अर्थ-मक्की !

                                             (प्रस्तुत कविता, मेरे काव्य-संग्रह-“जमीन से जुड़े आदमी का दर्द से उद्धृत की गयी है-अश्विनी रमेश )

Posted by: ashwiniramesh | May 20, 2011

—-प्रतिमा—–

पता नहीं

अचानक एक दिन

कैसे मैं

ईश्वर के मन्दिर में

प्रवेश कर गया

वहां

 नग्न

विमूढ़

और

 भावशून्य निर्जीव प्रतिमा देखते ही

उदास मन से सोचा

क्या यही ईश्वरीय रूप है

फिर एक नज़र देखा

प्रतिमा

सुन्दर

और उजली लगी

मैंने फिर स्वयं से पूछा

यही ईश्वरीय रूप है

फिर देखा

प्रतिमा

जैसे अट्टहास कर रही हो

तुम

भक्त के चोले में लिपटे

वह अहंकारी और मोही पुरुष नहीं हो

जो मेरा यही रूप

देखना चाहते हो

इतना सोचते ही

 मैं

भाव विह्वल हो गया

मैंने देखा

सजीव हुई प्रतिमा की

डबडबायी हुई आँखों से

जैसे आँसू टपक रहें हों

मैंने

मन ही मन

कहा

बस——

मैं तुम्हारा

यही रुप

देखना चाहता था

और मैंने अब यह जान लिया

कि

मन और मन्दिर में

तुम्हारा

यही एक

पूजनीय रुप है

——————–                     (प्रस्तुत कविता, मेरे काव्य-संग्रह-“जमीन से जुड़े आदमी का दर्द”, से उद्धृत की गयी है–अश्विनी रमेश)

Posted by: ashwiniramesh | May 20, 2011

The World of Creative Writing -Welcomes You

Dear Readers,

The above titled Blog is my new blog.In this Blog you would shortly,find the interesting reading of all genres of literature i.e.. in Hindi ,English Urdu languges. Also Philosophical-Spiritual topics with realistic touch would find place in this blog.

Posted by: ashwiniramesh | May 20, 2011

Hello world!

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